बाहरी और भीतरी दोनों में समन्वय रखो -ऋचा पान्डेय मिश्रा


अपनी जरूरतों को कम करो
ये जीवन जियो अंतर में
बहिर में न भटको

कितना भी सज लो, संवर लो
कितने भी चमकदार वस्त्र पहन लो
पर जब तक दिल में सुकून नहीं
आईने का अक्स भी खूबसूरत नहीं

प्रगति बाहरी भी है जरूरी माना
पर भीतर भी तो कुछ आगे बढ़ो

मानव के मूल्य घटते जा रहे हैं निरंतर
ये भ्रष्टाचार उन्हीं घटे हुए मूल्यों का है असर

बाहर की ओर प्रगति अनिवार्य है
पर भीतर को छोड़ देना मूर्खतापूर्ण कार्य है

सादा वस्त्र , सादा जीवन , सुन्दर विचार, आपसी प्यार
त्याग की भावना, दृढता की वीरता
अपने पथ पर बने रहने की अडिगता

जीवन जीने की है यही कला

भीतर पर ध्यान दो भारत
स्वयं को भीतर से प्रगतिशील करो
पढ़ो - लिखो, घुलो- मिलो, प्रार्थना करो, आगे बढ़ो
बाहरी और भीतरी दोनों में समन्वय रखो
समन्वय रखो

Comments

Unknown said…
Dear Pandita Richa ji,
I am really a fan of you for your creative writing.
You are a real politician in India who can turn the situation favorable to AAP guidelines.

God bless you

I am always with you. Tomorrow I am addressing a meeting of AAP at Sagar
Unknown said…
Dear Pandita Richa ji,
I am really a fan of you for your creative writing.
You are a real politician in India who can turn the situation favorable to AAP guidelines.

God bless you

I am always with you. Tomorrow I am addressing a meeting of AAP at Sagar

Popular posts from this blog

So what is eJeevika?

मैं अभी भी वहीँ खड़ी हूँ जहाँ कई सौ साल पहले खड़ी थी