मैं अभी भी वहीँ खड़ी हूँ जहाँ कई सौ साल पहले खड़ी थी
जहाँ कई सौ साल पहले खड़ी थी
आज भी मंदिर मस्जिदों के पट मेरे लिए बंद से हैं
आज भी शाम का सूरज ढलने पर मेरा जीवन मेरे हाथों से छिन जाता है
आज भी मैं न मेरे पिता का न मेरे पति का घर मेरा है
मैं अभी भी वहीँ खड़ी हूँ
जहाँ कई सौ साल पहले खड़ी थी
Comments