हम स्वयं कैसे हैं ,इस बात से ज्यादा यह महत्वूर्ण है कि हम किस पाले में खड़े हैं किन लोगों के साथ खड़े हैं
आदि काल से सियासत की लड़ाइयों में, विचार धारा के मलयुद्धों में एवं जीवन के पड़ावों में जब हम ऐसे दो राहे पर खड़े होते है जहाँ हमें किसिस एक को चुनना होता है तब यह जानना जरूरी हो जाता है की हम किस विचार धारा एवं चरित्र के लोगों का साथ देने वाले हैं/
महाभारत में आचार्य द्रोण के दो शिष्य थे , अश्वथामा एवं अर्जुन/ दोनों ही बड़े पराक्रमी, चरित्रवान, गुणवान, शक्तिशाली योधर एवं शूर वीर थे / परन्तु दोनो के खेमे अलग अलग थे /
भीष्म पितामह जैसे महापराक्रमी अपनी प्रतिज्ञा की मजबूरी के कारण कौरवों से बंधे रहे यह उनका निजी चुनाव था / परन्तु वहीं एक समय ऐसा था की जब विभीषण ने श्री राम के पक्ष को चुना/ हम किसे चुनते हैं इससे हमारी नियति तय होती है/
आज के परिपेक्ष में देखें तो माननीय किरण बेदी जी द्वारा भा जा पा के खेमे को चुनने का फैसला भी उसी प्रकार अक्षम्य है जैसे की युग पुरुष भीष्म पितामह, आचार्य द्रोण , अश्वत्थामा आदि /
किरण बेदी जी का यह फैसला दो कारणों से सही नहीं है पहला कारण तो यह कि जैसे जल और घी का कोई मेल नहीं है वैसे ही भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के गुट का एवं जीवन पर्यन्त स्वछ , नैतिक एवं ईमानदारी से जीवन जीने वाले लोगों का भी कोई मेल नहीं हो सकता है / अतः यह मेल शुरू से ही बेमेल है / विकास के लिए जो एकजुटता चाहिए वह यहाँ संभव नहीं है/
दूसरी वजह यह है कि ईमानदार व्यक्ति के प्रशंसक और उससे प्रेरणा लेनेवाले साधारण जन भी अपने प्रेरणा स्रोत के पद चिन्हों पर चलने लगतें हैं/ अतः समाज के प्रति जिनकी अधिक जिम्मेदारी बनती है अगर वे ही गलत चुनाव करेंगे तो समाज भी गलत दिशा में जाने लगता है/ और जब प्रेरणा स्रोत व्यक्ति को अपनी गलती का एह्साह होता है तब समाज स्वयं को ठगा सा महसूस करने लगता है और उसका अन्य सभी 'सही' लोगों पर से विश्वास उठ जाता है/
विभीषण का चुनाव उचित कैसे था और द्रोण का या अश्वथामा का चुनाव अनुचित क्यों था? विभीषण के जीवन का केंद्र वह स्वयं नहीं था , यानि केंद्र में 'करता' नहीं था 'कार्य' था अथवा 'कारण' था/ दूसरी तरफ आचार्य द्रोण या अश्वथामा के जीवन का केंद्र 'कार्य ' नहीं था बल्कि वे स्वयं यानि 'कर्ता ' थे /
जब 'कर्ता ' स्वयं को कार्य से ऊपर मानने लगता है तब उसका चुनाव 'अहं ' को तृप्त करनेवाला हो जाता है/ 'कार्य ' निम्न हो जाता है, 'कर्ता' का कर्तापन उस पर हावी हो जाता है /
श्री राम की सेना हो या पांडवों की , दोनों ही हर भौतिकतावादी साधनो से दीन थे लेकिन केवल अपने नैतिकता के भाव, कार्य की श्रेष्ठता के कारण भिन्न थे /
किरण बेदी जी का राजनैतिक पार्टी का चुनाव यह दर्शाता है कि जीवन भर के मिशन अथवा 'कार्य' के प्रति समर्पण ने निजी अहं को तुष्ट करने की अदम्य पुकार के सामने घुटने टेक दिए / IAC मूवमेंट में अग्रिण भूमिका से जो 'कार्य' का संतोष तो मिला परंतू अपने वैचारिक मनोवृति के कारण आम आदमी पार्टी के साथ तालमेल नहीं बिठा पाया / इसी पड़ाव से शायद 'कर्ता ' ने सिर उठाना शुरू करदिया था/
जब दिल्ली की सियासी गर्मी बढ़ी तो अप्रासंगिक होने के डर ने उन्हें आखिर में 'कर्ता ' का दास बना दिया और वो भा जा पा के सम्मान एवं मनुहार का शिकार हो गयीं /
बुलाया तो श्री कृष्णा को दुर्योधन ने भी था, पूरे ताम झाम सम्मान के साथ/ परन्तु श्री कृष्ण ने सिराहने बैठे दुर्योधन को नकार के चरणो में स्थित दीन हीन अर्जुन को चुना / वे एक छोटी सी मुट्ठी भर लोगों की सेना के सारथी बने और इतिहास बदल दिया/ यह होता है चुनाव /
अप्रासंगिक होने के डर से हममे जो वेदना उठती है वह हमें भ्रम में डाल देती है और हमारे चुनाव करने की शक्ति को कम कर देती है / शायद यही किरण बेदी जी के साथ भी हुआ है/ आदि काल से मानव अनेको दो राहों पर खड़ा रहा है और शायद बिरले ही हैं जो सही कदम उठा पाये हों /
जिस अहं की तुष्टि के लिए हम भ्रमात्माक चुनाव करते हैं वह फलता नहीं है/ क्षण - क्षण ठीक उसी प्रकार कष्ट देता है जैसे कि भीष्म को अपनी पौत्रवधू के चीर हरण के समय हुआ होगा, मंदोदरी को पुष्पवाटिका में बैठी सीता को देख कर हुआ होगा , आचार्य द्रोण को कपटी दुर्योधन के अहंकार को झेलते समय हुआ होगा/ ये लोग चाहते हुए भी कुछ नहीं करपाये , केवल इसलिए क्योंकि इनके खेमे का चुनाव था/
जब भ्रम हटेगा तो दिखेगा कि किरण जी के चारों तरफ भ्रष्ट नेता जनता के पैसे से लेंन - देन , व्यापार , कारोबार कर कहे होंगे / सत्ता बनाये रखने के लिए सांप्रदायिक हिंसा की अग्नि जलाएंगे और ये कुछ भी नहीं कर पाएंगी/ या तो इस प्रकार के कार्य कलापों को अनदेखा कर के स्वयं को निरर्थक कार्यों में उलझने की कोशिश करेंगी या राजनीती से पलायन ही आखिरी उपाय होगा/
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