मगर आज भी मंदिर के पट बंद हैं, मस्जिद के दरवाज़े भी बंद हैं
बर्दाश्त करते , इंतज़ार करते
कि अब तो मुझे कोई मेरे नाम से
कि अब तो मुझे कोई मेरे काम से
कि अब तो कोई मेरे सम्मान से
मुझे जानेगा , पहचानेगा
मगर आज भी मंदिर के पट बंद हैं
मस्जिद के दरवाज़े भी बंद हैं
मेरी सन्ताने ही मुझे खुद से दूर रखती हैं
मैं माँ हूँ , मैं देवी हूँ , ये जग मेरी वजह से है
पर मेरी पहचान ही मेरी दुर्गति का कारण बन गयी है
गलती मेरी है
मैं अपनों से आस लगाई सम्मान की
भूल गयी थी सदियों से
ये है मेरी अपनी लड़ाई
अब मुझे ही आवाज़ उठानी होगी
अब मुझे ही ललकारना होगा
मेरे ही घर में मुझे सम्मान मिले
इसकेलिए मोर्चा सम्भालना होगा
हद हो गयी है
इंतज़ार सदियों का हो गया है
उठ रही हूँ मैं खुद ही
अपने सम्मान के लिए अब
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