अपने हक़ की लड़ाई को आगे ले जाना होगा


मैं एक सोच हूँ
जो सदियों से
अपने निर्मित दायरों से लिपटी हुई हूँ
मैं एक रौशनी हूँ
जो केवल दिए में नहीं
माँ की आँखों की चमक में भी बसी हूँ

मैं दायरे तोडना नहीं चाहती
मैं आँखों से छलकना नहीं चाहती

मैं सोच को विस्तृत करना चाहती हूँ
ताकि मेरी बेटी भी अपनी आँखों में चमक लिए
मुझे याद कर सके

पर सोच का दायरा बढ़ाना
बड़ी हिम्मत का काम है
बड़ा इम्तहान है

पर मुझे हिम्मत करनी होगी
मेहनत से , अपनी सखियों के साथ
अपने हक़ की लड़ाई को आगे ले जाना होगा

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