लिंग भेद, जाति भेद - जिम्मेदार कौन
मैंने कहीं पढ़ा था कि अंबेडकर इस बात के खिलाफ थे की गांधी दलितों के उत्थान की बात करें I जिसने कभी वो अपमान सहा ही नहीं वो उस के बारे में कैसे महसूस कर सकता है ? हाल ही में महिलाओं को मंदिरों में जाने की अनुमति न होने पर कुछ में एक खबर बनी जिसका दोहन मिडिया ने हमेशा की तरह बखूबी किया I उनका काम है तत्थ्यों पर खबर बनाना और उसे जनता तक पहुँचाना , वे ये काम बखूबी करते हैं I ये खबरें आम जनता की सुबह की चाय , मेट्रो के सफर, शाम की सैर और रात का खाने में ताज़गी, स्वाद , मनोरंजन ल देती हैं I लोग वापस अपने काम पर लग जाते हैं I
फिर लिंग भेद होगा, फिर कहीं दुष्कर्म होगा , फिर कोई अपमानित होगा और मीडिया फिर सब से ताजा, सबसे तेज खबर परोसने में लग जाएगी , नेता उन खबरों में आने के लिए फिर दौड़ेंगे और समाज वहीं का वहीँ रह जायेगाI
दोष किसका है कि समाज आगे नहीं बढ़ रहा , कि समाज कुछ नहीं सीख रहा, कि बार बार वही गलती दोहराई जा रही हैI इन प्रश्नो का उत्तर केवल व्यक्ति ही दे सकता है I दोष इकाई का है सैकड़ा और हज़ार का नहीं I एक महिला , एक माँ जो स्वयं लिंग भेदभाव के खिलाफ नहीं कड़ी होती, जो कभी पति से कभी सास से , कभी अपनी लाचारी से डरती है , दोष उसका है I दोष उन धनाढ्य दलितों का है , उन धनी दलित सांसदों, राजनीतिज्ञों का है जो केवल स्वयं के बारे में सोचते है I दोष उस माँ का है जो निर्भया कांड के दोषी को आज तक घर से नहीं निकाल पायी I दोष उस पत्नी का है जो दो रोटी, कपडा, माकन के लिए अपनी बेटी को मरवा देती है I दोष केवल इकाई का है I
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